आदिवासी मेले में मयूरभंज छऊ नृत्य ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध : ओडिशा की समृद्ध आदिवासी और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन 

Jan 29, 2026 - 01:23
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आदिवासी मेले में मयूरभंज छऊ नृत्य ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध : ओडिशा की समृद्ध आदिवासी और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन 

बालासोर, 27 जनवरी 2026 (कृष्ण कुमार मोहंती): आदिवासी मेले में यूनेस्को से मान्यता प्राप्त मयूरभंज छऊ नृत्य की एक मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस कार्यक्रम के माध्यम से ओडिशा की समृद्ध आदिवासी और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन हुआ।

मयूरभंज जिले के कोही, मोरदा स्थित श्री जगतेश्वर छऊ नृत्य परिषद के कलाकारों ने महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा, जिन्हें धरती आबा के रूप में जाना जाता है, के जीवन पर आधारित एक प्रभावशाली नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया।

इस प्रस्तुति में बिरसा मुंडा के साहस, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध उनके संघर्ष तथा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अमूल्य योगदान को सजीव रूप से दर्शाया गया। साथ ही, आदिवासी समाज की परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को भी प्रभावी ढंग से उजागर किया गया।
समराजित टिपिरिया, श्रीकृष्ण भोई, मनोज महाना, कृष्ण सी, चंदन महाना, तरुण कुमार तुंगा, प्रियब्रत महाना, अस्तमी भोई, अनुपमा महाना, सोनाक्षी टिपिरिया, दीपिका पाटबंधा, अपर्णा टिपिरिया और लक्ष्मीप्रिया भोई सहित कलाकारों ने भावनात्मक और सशक्त अभिनय से दर्शकों की भरपूर सराहना प्राप्त की।

इस दल का मार्गदर्शन गुरु गांधी जयंता टिपिरिया ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख अतिथियों में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एवं पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक डॉ. गोपबंधु मलिक, उपन्यासकार प्रो. रश्मि रौल, प्रो. शंकर चरण जेना, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व अधिकारी परेश नाथ पात्र, सुलग्ना सुचारिता तथा सुधाकर नायक शामिल थे, जिन्होंने कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए ओडिशा सरकार ने छऊ कलाकारों को प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर सिटिज़न्स ह्यूमन राइट्स क्लिनिक, ओडिशा की ओर से प्रो. रश्मि रौल ने बिरसा मुंडा की भूमिका के प्रभावशाली निर्वहन हेतु समराजित टिपिरिया को विशेष प्रशस्ति पत्र प्रदान किया।

यह प्रस्तुति आदिवासी मेले का एक प्रमुख आकर्षण रही, जिसने कलात्मक उत्कृष्टता के साथ ऐतिहासिक चेतना को जोड़ते हुए आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंत शक्ति को पुनः स्थापित किया।