ओड़िया भाषा पहचान की जीवनरेखा है, वक्ताओं का मत
* राधा रंजन पटनायक की पुस्तक ‘ओडिया भाषा कल्परा बाण्मय विधा’ का लोकार्पण
बालेश्वर, 1 फरवरी (कृष्ण कुमार महान्ति): भाषा किसी भी समुदाय की पहचान होती है और ओड़िया भाषा के जीवित रहने से ही ओड़िया जाति का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा। यह विचार कदराबाद स्थित पार्वती निलयम के द रिकवरी परिसर में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में वक्ताओं ने व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि परिवार और समाज भाषा शिक्षा की नींव हैं, जबकि विद्यालय उसका प्रयोगशाला हैं।
प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. राधा रंजन पटनायक द्वारा लिखित पुस्तक ‘ओडिया भाषा कल्परा बाण्मय विधा’ का आज गंभीर और भावपूर्ण वातावरण में औपचारिक लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्या भारती प्रकाशन संस्था के संस्थापक एवं प्रकाशक अभय दास ने की। मुख्य अतिथि के रूप में रेबती पत्रिका की संपादिका एवं बस्ता की विधायक श्रीमती सुभासिनी जेना ने कहा कि बच्चे को भाषा के प्रारंभिक संस्कार आंगनवाड़ी स्तर से ही मिलते हैं। इसलिए भाषा के प्रति रुचि और अपनापन पैदा करना आज की बड़ी आवश्यकता है।
मुख्य वक्ता के रूप में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं कवि देवेंद्र कुमार महापात्र ने साहित्य के प्रति घटती रुचि और पाठकीयता में आ रही कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि डॉ. पटनायक की यह सृजनात्मक कृति न केवल पाठकों के लिए, बल्कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए भी शिक्षण प्रक्रिया की एक उपयोगी मार्गदर्शिका सिद्ध होगी।
आलोचक के रूप में डॉ. दीपिका सेनापति ने कहा कि यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिए एक हैंडबुक की तरह काम करेगी। उन्होंने बताया कि इसमें वर्ण-परिचय, रेखा-चित्र, गद्य, पद्य, अतिरिक्त साहित्य, व्याकरण, छंद, अलंकार तथा प्रश्नपत्र निर्माण जैसे विषयों का सूक्ष्म और व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है, जो आने वाली पीढ़ी के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।
अन्य विशिष्ट अतिथियों में प्रोफेसर डॉ. शिरीष चंद्र जेना, डॉ. राखाल चंद्र घड़ेई और स्तंभकार कुलमणि बारिक ने ओड़िया भाषा शिक्षण की वैज्ञानिक पद्धतियों पर प्रकाश डाला और पुस्तक के शीर्षक पर सौंदर्यपरक चर्चा की। कुलमणि बारिक ने ओड़िया भाषा के प्रति सरकार की उदासीनता पर भी क्षोभ व्यक्त किया। संयोजक डॉ. अंतर्ज्यामी पांडा ने लेखक की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के आरंभ में कृषि वैज्ञानिक डॉ. केशब चंद्र पांडा ने वैदिक मंत्रोच्चार किया, जबकि बांसुरी वादक विजय कुमार महान्ति की “आहे नीलशैल” की प्रस्तुति से वातावरण आध्यात्मिक हो उठा। दिवंगत साहित्यकार डॉ. बंशीधर चौधुरी की स्मृति में एक मिनट का मौन रखा गया।
‘पृष्ठदृष्टि’ खंड में कथाकार उदय नारायण दास ने अपनी पुस्तक ‘राधा’ डॉ. पटनायक को भेंट की। साहित्यकार अश्विनी सतपथी और ममता महान्ती ने भी अपनी-अपनी पुस्तकों का अर्पण किया। कवि पद्मलोचन दत्त ने पुष्पगुच्छ और उत्तरीय प्रदान कर डॉ. पटनायक को सम्मानित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में कुमारी अदिति और विद्याधर नायक ने अतिथियों का पुष्पगुच्छ, उत्तरीय और बैज देकर स्वागत किया। ज्योतिप्रभा और आयुष्मिता ने संयुक्त रूप से मंच संचालन में सहयोग किया। अंत में डॉ. अभिमन्यु कानुनगो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर बालेश्वर के अनेक बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् और कवि उपस्थित रहे और डॉ. पटनायक को शुभकामनाएं एवं बधाइयां दीं।